Saturday, 24 November 2012

चलन...

प्रोफेशनल बहू चाहिए

मेरे बेहद करीबी मित्र हैं मिश्रा जी, शालीन सहज, स्वभाव में उनका कोई सानी नहीं। खानदानी हैं मगर वसूल के पक्के। एक ही चिंता उन्हे खाये जा रही है किसी तरह बेटी के हाथ पीले हो जावे। जिसके घर जवान बेटी हो भला उसे दिन में चैन रात में नींद कहां सो मिश्रा जी भी अपनी बेटी के लिए सुयोग्य वर की तलाश में चक्कर लगाते-लगाते घनचक्कर तो गयें मगर जोड़ा बैठा ही नहीं। बेहद हैरान परेशान होकर एक दिन मुझसे पूछ बैठे भाई साहब... क्या इस युग में लड़का का बाप होना किसी अपराधी से कम है क्या?     
उनके चेहरे को पढ़ते हुए मैने ढांढस बढ़ाते हुए कहा... जी बिल्कुल नही, कौन कहता है? जिसके घर गुणवान चरित्रवान लड़की है तो अच्छा रिश्ता खुद--खुद चलकर उसके दरवाजे पर दस्तक देता है। मिश्रा जी ने बात काटते हुए कहा जनबा... कौन मुर्ख होगा जो अपनी दही को खट्टा कहेगा। बाप जब लडकी के रिश्ता की खातिर पोटली में सत्तू लेकर लडका ढ़ूढने निकलता है तो उसके हाथ में लड़की की जन्म कुण्डली के साथ दो पेज का स्पेशल डिजाइंड क्वालीफिकेशन का सी. वी. भी रहता है। जिसको दिखाकर बाप मार्केटिंग रिप्रजेंटेटिव की तरह लड़की की एक-एक खूबी को बयान करने से नहीं चूकत। फिर भी ऐसे हालत में अगर लड़के वाले उसे लिफ्ट नहीं देंगे तो जरा सोचिए उसे कितना हताशा निराशा के साथ गुस्सा आवेगा।
मिश्रा जी आप बेहद काबिल समझदार इंसान हैं लेकिन बुरा माने तो एक बात कहूं...? लड़की के बाप को बुरा मानने का अधिकार ही कब मिला है। अगर वह बुरा मानता है तो शादी के लोकतांत्र्रिक ढांचे का अतिक्रमण माना जायेगा। ऐसे हालात में वह अपनी पोटली, कुण्डली सी.वी. किसी नाले में फेंक कर लड़की के रिश्ता के बारे में सोचना बंद करे। काफी सोच-विचार के बाद मैंने कहा मिश्रा जी एक तजवीज है अगर आप अमल करे तो शायद बात बन जावे। आज कल मीडिया का क्रेज बढ़ा है, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियां अपने माल बेचने के लिए पत्र-पत्रिकाओं का सहारा ले रही हैं। क्वालीटि से ज्यादा ढींढोरा पीटा जा रहा है से आप भी किसी अच्छे अखबार में बर के लिए इस्तेहार दे दीजिए फिर देखिए धडा-धड रिश्तों की बारिश आन पडेगी। तजबीज बुरा था सो मिश्रा जी मुतमइन होकर मेरा हकीमी नुस्खा आजमाने चले मैं भी दूसरे कामों में मसरूफ हो गया।  
तकरीबन चार सप्ताह बाद दोपहर के वक्त मिश्रा जी ने दस्तक दिया। बढ़ी दाढ़ी, बेतरतीब बाल, चीमड़ा कपड़ा एक दम हालात के मारे हताश निराश। अरे जनबा... क्या हाल बना रखा है, किसी बीमार में मुबतिला तो नही हो गये? क्या बताउं भाई साहब, घर में जवान लड़की को देखने के बाद कलेजा मुंह को आता है। लडका ढ़ूंढ़ते-ढ़ूंढ़ते चप्पल घिस गया मगर बात बनीं। कुछ कुछ टेक्निकल प्राब्लम ही जा रहा है। इस्तेहार से कुछ बात बनीं...? हां कुछ जगह बात एक दो स्टेप आगे बढ़ा मगर आखिरी मरहले में प्रोफेशनल डिस्क्वालीफिकेशन। अच्छे खासे परिवार के कमाशुद लड़के, बड़ी सैलेरी, नामची कम्पनियां और प्रोफेशनल रईस किस्म के खानदान वले। जितना अच्छा पोस्ट, जितनी अच्छी सैलेरी उतना ही बड़ा लालची कंगाल! मिश्रा जी मैं कुछ समझा नहीं क्या ज्यादा डिमाण्ड वाली बात है? जी नहीं इनके पास जाइए तो पहला सवाल... लड़की की प्रोफेशनल क्वालीफीकेशन क्या है? ...फिर, लड़की कहां जाब करती है? ... सैलेरी पैकेज क्या है? तो क्या हुआ महंगाई का जमाना है, अच्छी सोच है सौ रूपये दाल, सौ रूपये तेल, पचास रूपये चावल तीस रूपये दूध सो दोनों मिलकर इस सुरसा जैसी महंगाई का मुकाबला करेंगे तो क्या बुरा है? आप बिल्कुल ही गलत सोच रहे हैं जनबा, मिश्रा जी ने कहा... सच्चाई यह है कि मंदी के मार से बेजार ऐसे बापों का भरोसा अपने लड़को से उठ गया है। उनको अपने लड़को को नौकरी से निकाले जाने का खतरा चैबीसो घंटे दीमक की तरह चाट रहा है। उनके सामने पेट पालने का विकट समसया उत्पन्न होता दिख रहा है। ऐसे में वे अपने परिवार की आर्थिक दशा निरंतर बरकरार रखने अपने निकम्मे निठल्ले लड़कों का खर्च चलाने की खातिर प्रोफेशनल बहू का फण्डा अपना रहे हैं। वे इस जुगाड़ में हैं कि उनके परिवार का भरण-पोषण इन प्रोफेशनल बहुओं से चलता रहे तथा वे बढ़ते महंगाई के खौफ से बेखौफ रहें। शर्म नहीं आती इन टुच्चों को कि औरतों के दम पर जलालत भरी जिन्दगी जीने की सोच रहे हैं। क्यों ये लोग कटोरा लेकर भीख मंगना शुरू कर देते। सबसे पहले ऐसे किस्म के भिखमंगों मैं भीख दूंगा।
शान्त... शान्त... शान्त मिश्रा जी। काहें को इतना गुस्सा कर खुद का खून जला रहे हैं। ये प्रोफेशनल टाइप के भीखारी आजकल बड़ी तेजी से समाज में बढ़ रहे हैं। जाने दीजिए अब महिलाओं को बराबरी का हक मिलने जा रहा है, वे खुद--खुद प्रोफेशन हो रही हैं और ऐसे मार्डन टाइप के प्रोफेशनलों को सबक सीखाएंगी। ये बताइए कि इस हालत में आपने क्या सोचा है..? एक बात कान खोलकर सुन लीजिए जनबा! किसी  बेरोजगार को अपनी बेटी का हाथ दे दूंगा, भले कुंवारी रह जाएगी मगर ऐसे प्रोफेशनल भिखमंगों के चैखट पर कदम नहीं रखूंगा। जो प्रोफेशनल बहुओं के सहारे परिवार चलाने की सोच रहे हों। यकीन हो रहा हो तो आप मुझे देख लिजिएगा।

एम. अफसर खां सागर

2 comments:

  1. वर्तमान समय में इस तरह का चलन आम होता जा रहा है।
    बेहतर तंज, बधाई हो!

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  2. Bahut hi sateek likha hai aapne

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